यह रिपोर्ट अमेरिका और ईरान के बीच झगड़े को कवर करती है, जिसमें इन खास बातों पर फोकस किया गया है:
मुख्य मुद्दा:
न्यूक्लियर बातचीत: वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस ने कहा कि ईरान UN के न्यूक्लियर इंस्पेक्टरों को अपनी न्यूक्लियर फैसिलिटी तक पहुंचने देने पर सहमत हो गया है, इस दावे को ईरान ने मना कर दिया है।
रिश्तों की स्थिति: दोनों पक्षों में तीखी बहस हुई है। प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने सबके सामने होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने की धमकी दी है, जबकि ईरान का दावा है कि उसने लेबनान में इजरायली हमलों का बदला लेने के लिए ऐसा किया है।
बातचीत की प्रोग्रेस: जेडी वेंस ने कन्फर्म किया कि बातचीत चल रही है और आगे बढ़ रही है, भले ही सोशल मीडिया पर ईरान के पीछे हटने की खबरें आ रही हों।
ऑब्जर्वेशन और बहस:
पाबंदियों को डीक्रिमिनलाइज़ करना: अमेरिका ने इस शर्त पर ईरानी एसेट्स को डीक्रिमिनलाइज़ करने का प्रस्ताव दिया कि उनका इस्तेमाल सिर्फ अमेरिकी एग्रीकल्चरल प्रोडक्ट्स की खरीद के लिए किया जाए। इससे मीटिंग में फंड्स के असल इस्तेमाल को वेरिफाई करने के तरीकों को लेकर सवाल उठे।
एक्सपर्ट्स की राय: एनालिसिस से पता चलता है कि ईरान में अपनी सरकार बदलने की स्ट्रैटेजी के उम्मीद के मुताबिक फेल होने के बाद अमेरिका झगड़े से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढने की कोशिश कर रहा है।
US के ईरानी एसेट्स को डीक्रिमिनलाइज़ करने के प्रस्ताव से चीन पर असर (जैसा कि पहले बताया गया है) यह तेल की कीमतों से जुड़े इन मुद्दों से पैदा होता है:
डिस्काउंट पर तेल खरीदना: पहले, चीन प्रतिबंधों के तहत ईरान से तेल खरीदने वाले सबसे बड़े कस्टमर्स में से एक था, जिससे चीन बहुत डिस्काउंटेड कीमतों पर तेल खरीद पाता था।
मार्केट कीमतों में बदलाव: जब US अपने एसेट्स को डीरेगुलेट करेगा और लेन-देन की शर्तों में बदलाव करेगा, तो ईरान मार्केट रेट पर तेल बेच पाएगा। इसका मतलब है कि चीन अब उसी डिस्काउंटेड कीमत पर तेल नहीं खरीद सकता, जो चीन के लिए एक नेगेटिव फैक्टर है।